देहरादून। जलवायु परिवर्तन पर कृषि की भूमिका व ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने को लेकर जलागम विभाग में चल रही दो-दिवसीय कार्यशाला का आज समापन हो गया। उत्तराखंड जलवायु अनुकूल बारानी कृषि परियोजना (यूसीआरआरएफपी) के अंतर्गत आयोजित इस कार्यशाला में धान की खेती में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने के विभिन्न तरीकों पर चर्चा की गई। समापन सत्र में राज्य स्तरीय जलागम परिषद के उपाध्यक्ष शंकर कोरंगा ने जलागम विभाग और किसानों के बीच सामंजस्य से काम करने की बात कही। उन्होंने कहा कि बेहतर सामंजस्य से परियोजना का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंचेगा।
इस अवसर पर जलागम सचिव व मुख्य परियोजना निदेशक दिलीप जावलकर ने कहा कि ग्रीन हाउस गैस एक विकराल समस्या के रूप में हमारे सामने है। इसे देखते हुए कृषि के तरीकों में भी बदलाव आवश्यक हो गया है। ऐसे में वर्षों से पारम्परिक खेती कर कर रहे किसानों को सही जानकारी देकर उनकी सोच में बदलाव करने की जरूरत है।
स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवनेशन अथॉरिटी (सारा) की परियोजना निदेशक कहकशां नसीम ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि इस तरह के प्रशिक्षण बेहद लाभकारी होते हैं। अब यहां से लिए ज्ञान को फील्ड में बेहतर तरीके से क्रियान्वित कराना महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे पहले कंसोर्सिया पार्टनर केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक से आए वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार ने धान की पारम्परिक खेती के अन्य वैकल्पिक तरीकों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने समेकित पोषण प्रबंधन के लिए सीएसए एक्सपर्ट ऐप जैसे विभिन्न मोबाइल एप्लीकेशन के उपयोग के विषय में बताया।
कंसोर्सिया पार्टनर के रूप में केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान उत्तराखंड में पहली बार ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए गैस चैंबर तकनीकी का प्रयोग करने जा रहा है। कार्यशाला में जलागम निदेशालय के अधिकारीगण, फील्ड से आए अधिकारी व कार्मिकों के साथ ही विभिन्न जिलों के धान उत्पादक कृषक उपस्थित रहे।

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