ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने पर जलागम विभाग में मंथन

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देहरादून। जलवायु परिवर्तन पर कृषि की भूमिका व ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने को लेकर आज जलागम विभाग में वैज्ञानिक, नीति निर्माताओं तथा किसानों ने मंथन किया। जलवायु अनुकूल वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों पर आधारित धान की खेती विषय पर दो-दिवसीय कार्यशाला का शुभारम्भ किया गया। उत्तराखंड जलवायु अनुकूल बारानी कृषि परियोजना (यूसीआरआरएफपी) के अंतर्गत आयोजित इस कार्यशाला में धान की खेती में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने के विभिन्न तरीकों पर चर्चा की गई। परियोजना के माध्यम से जलागम विभाग उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों में इन तरीकों का प्रयोग करेगा।

कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए परियोजना निदेशक, यूसीआरआरएफपी हिमांशु खुराना ने कहा कि परियोजना के तहत ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने का एक मॉडल तैयार किया जाएगा, जिसे बाद में प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी अपनाया जा सकेगा। परियोजना के विषय में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि क्षमता विकास के माध्यम से किसानों को सशक्त बनाना परियोजना का एक मुख्य उद्देश्य है, ताकि परियोजना समाप्ति के बाद भी किसान अपनी आजीविका बेहतर तरीके से चला सके।

कंसोर्सिया पार्टनर केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक से आए वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार ने धान की पारम्परिक खेती के अन्य वैकल्पिक तरीकों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि देश में कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का 18 प्रतिशत हिस्सा खेती का है और खेती में भी 18 प्रतिशत उत्सर्जन सिर्फ धान की फसल से होता है। ऐसे में केन्द्र सरकार धान की सीधी बुआई (डीएसआर) व कम पानी से अधिक धान की उपज (अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग-एडब्ल्यूडी) जैसी तकनीकों पर अधिक जोर दे रही है। डा. अंजनी कुमार ने कहा कि मीथेन का उत्सर्जन पिछले सौ वर्षों में दो गुना से ज्यादा हो चुका है।

कार्यशाला में ग्रीन हाउस गैसों के अधिक उत्सर्जन की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर भी मंथन किया गया। इसमें Abiotic Stress जैसे अत्यधिक वर्षा, तापमान में बदलाव, सूखा व बाढ़ के बदलाव की स्थिति तथा उसके नियंत्रण हेतु प्रभावी धान की वैरायटी पर चर्चा हुई। इस दौरान धान की बुआई से लेकर उत्पादन तक इस्तेमाल होने वाली विभिन्न तकनीकों के विषय में भी विस्तार से बताया गया। कार्यशाला में क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर प्रैक्टिसेस तथा धान की सीधी बुआई (डीएसआर) के विषय में भी जानकारी दी गई।

कार्यशाला में परियोजना निदेशक यूसीआरआरएफपी हिमांशु खुराना व परियोजना निदेशक, स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवनेशन अथॉरिटी (सारा) कहकशां नसीम, जलागम निदेशालय के अधिकारीगण, फील्ड से आए अधिकारी व कार्मिकों के साथ ही विभिन्न जिलों के धान उत्पादक कृषक उपस्थित रहे।

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