उत्तराखंड में 500 आयुष डाॅक्टरोें के लाइसेंस निरस्त

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देहरादून। भारतीय चिकित्सा परिषद ने उत्तराखंड में भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद अधिनियम 1970 के प्राविधानों से इतर किए गए समस्त आयुष चिकित्साधिकारियों के पंजीकरणों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है। रजिस्ट्रार नर्वदा गुसाईं की ओर से जारी

आदेश में कहा गया है कि उक्त पंजीकरण प्रमाण-पत्र के आधार पर चिकित्साभ्यास किया जाना अवैध होगा।
उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले अपर सचिव आयुष, डॉ. विजय कुमार जोगदंडे ने भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तराखंड के रजिस्ट्रार को निर्देश दिए थे कि ऐसे सभी चिकित्सकों के पंजीकरण रद्द करें, जिनके पास बीएएमएस (बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी) या बीयूएमएस (बैचलर ऑफ यूनानी मेडिसिन एंड सर्जरी) के बजाय अन्य राज्यों के डिप्लोमा हैं।

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद, राज्य की भारतीय चिकित्सा परिषद ने उत्तर प्रदेश के आयुष चिकित्सकों के पंजीकरण को वैध मानते हुए उन्हें उत्तराखंड में पंजीकृत किया था। उस समय का नियम यह था कि यूपी में पंजीकृत आयुष चिकित्सक उत्तराखंड में भी अपनी प्रैक्टिस जारी रख सकते थे। हालांकि, समय के साथ इस नियम का दुरुपयोग होने लगा। वर्ष 2019 से मार्च 2022 तक, उत्तराखंड में भारतीय चिकित्सा परिषद ने उन डिप्लोमा धारकों को भी पंजीकृत करना शुरू कर दिया, जिनके पास अन्य राज्यों के डिप्लोमा थे, लेकिन वे डिप्लोमा मान्यता प्राप्त नहीं थे।

उत्तरांचल (संयुक्त प्रांत भारतीय चिकित्सा अधिनियम 1939) अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश 2002 की धारा 27, 28, 29, 30 के तहत नए डिप्लोमाधारकों को भी पंजीकरण देने की प्रक्रिया शुरू हुई। वर्ष 2019 से 2022 तक 500 से अधिक आयुष और यूनानी डिप्लोमा धारकों को पंजीकरण दिया गया, जो अब विभिन्न स्थानों पर प्रैक्टिस कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश चिकित्सकों के पास डीआईयूएम (डिप्लोमा इन यूनानी मेडिसिन) या डीआईएएम (डिप्लोमा इन आयुर्वेदिक मेडिसिन) जैसे डिप्लोमा थे, जिनकी मान्यता को लेकर कई विवाद उठे हैं।

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