एनजीटी में हेमंत सिंह गोनिया की याचिका से उठे सवाल

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अनट्रीटेड सीवेज, अवैध निर्माण और गिरता जलस्तर बना नैनी झील के अस्तित्व पर संकट

नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल की जीवनरेखा कही जाने वाली नैनी झील इन दिनों गंभीर पर्यावरणीय संकट और प्रशासनिक लापरवाही की मार झेल रही है। समाजसेवी एवं सूचना अधिकार कार्यकर्ता हेमंत सिंह गोनिया ने 14 अक्तूबर 2024 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में याचिका दायर कर झील में गिर रहे अनट्रीटेड सीवेज, कूड़े–कचरे और कैचमेंट क्षेत्र में अवैध निर्माण को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि झील में आज भी करीब चालीस ब्रिटिश कालीन नालों के माध्यम से सीधे गंदा पानी और ठोस अपशिष्ट पहुंच रहा है, जिससे झील का जल प्रदूषित हो रहा है और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
गोनिया ने झील के जलग्रहण क्षेत्र में अवैध निर्माण, पेड़ों की कटान और कंक्रीटीकरण को प्राकृतिक जल पुनर्भरण में सबसे बड़ी बाधा बताया है। रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2025 में नैनी झील का जलस्तर लगभग 4.7 फीट तक पहुंच गया, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे कम स्तर माना जा रहा है। कम वर्षा के साथ–साथ कैचमेंट एरिया में बढ़ते कंक्रीटीकरण और वर्षाजल के प्राकृतिक मार्गों के बाधित होने को इसके प्रमुख कारणों के रूप में देखा जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने जनवरी 2025 में सुनवाई के दौरान उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और कुमाऊं आयुक्त को शामिल करते हुए संयुक्त जांच समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। कुमाऊं आयुक्त को नोडल अधिकारी नामित कर एक माह के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है। अधिकरण ने नैनीताल नगर को प्रतिबंधित, विनियमित और विकास जोन में बांटने की अवधारणा पर भी जोर दिया है, ताकि अनियंत्रित निर्माण और गतिविधियों पर लगाम लगाई जा सके।
इधर, झील में ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए लगाया गया एरिएशन सिस्टम भी जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है। पाइप और अन्य उपकरणों के खराब होने से झील के कई हिस्सों में ऑक्सीजन की मात्रा घट गई है, जिसके चलते मछलियों की मौत की घटनाएं सामने आ रही हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे प्रदूषण और ऑक्सीजन की कमी का सीधा संकेत मान रहे हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय भी पूर्व में झील के खराब पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता जता चुका है और आशंका व्यक्त कर चुका है कि लंबे समय तक ऐसे पानी के संपर्क में रहने से स्थानीय लोगों में दीर्घकालिक बीमारियां पनप सकती हैं।
गोनिया लंबे समय से नैनी झील के संरक्षण और पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए संघर्षरत हैं। उन्होंने एनजीटी में याचिका दायर करने के साथ–साथ सूचना अधिकार कानून के तहत विभिन्न विभागों से सीवेज निस्तारण, कूड़ा प्रबंधन, निर्माण स्वीकृतियों और झील संरक्षण योजनाओं से जुड़े दस्तावेज भी जुटाए हैं। उनका कहना है कि यह मामला केवल झील की गंदगी तक सीमित नहीं, बल्कि नैनीताल की भविष्य की जल सुरक्षा, पारिस्थितिकी संतुलन, विकास नियंत्रण और स्थानीय नागरिकों के स्वास्थ्य से सीधे–सीधे जुड़ा हुआ है।
पर्यावरणविदों और स्थानीय नागरिकों ने एनजीटी की पहल को उम्मीद की एक मजबूत किरण बताया है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, वन विभाग और नगर निकाय कागजी कार्यवाही से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर सख्ती और पारदर्शिता के साथ कार्य करेंगे। यदि समय रहते ठोस और समन्वित कदम नहीं उठाए गए तो नैनी झील की सुंदरता के साथ उसका अस्तित्व और सरोवर नगरी नैनीताल के लोगों का स्वास्थ्य आने वाले वर्षों में गंभीर संकट की ओर बढ़ सकता है।




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