हरेले की खुशबू, लोक संस्कृति की धड़कन — भीमताल में बिखरे पहाड़ के रंग






भीमताल : हरेला सिर्फ एक पर्व नहीं, पहाड़ की मिट्टी की महक है। और जब वही महक सांस्कृतिक रंगों में ढलकर रामलीला मैदान में बिखरी, तो भीड़ के चेहरे पर मुस्कान और दिलों में गर्व साफ़ झलकता रहा। मेले के चौथे दिन भी भीमताल के रामलीला मैदान में मानो पूरा पहाड़ उतर आया हो। कहीं छोलिया नृत्य की गूंज थी, तो कहीं जौनसारी गीतों की मिठास। कुमाऊं की लोक-झांकियों ने दर्शकों को उनके अपने बचपन और गांव की गलियों में लौटा दिया। दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हरमन माइनर स्कूल की प्रधानाचार्या महिमा भट्ट और कुंदन चिलवाल ने किया। उनके शब्दों ने इस आयोजन की गरिमा को और ऊंचा किया — “यह मेला हमारी जड़ों से जुड़ने का जरिया है, और हमारी पहचान का उत्सव।”
विहिप ग्रुप की प्रस्तुति ने जैसे दर्शकों को मंच की ओर खींच लिया। राजस्थान के पधारो डांस ग्रुप और फॉरवर्ड डांस एकेडमी की लोक लहरियों ने तालियों की गूंज से आकाश भर दिया। लेकिन मेला सिर्फ मंच तक सीमित नहीं रहा। चारों ओर फैली लोक-हाट में जैविक अनाज, हस्तशिल्प, पारंपरिक जड़ी-बूटियाँ और स्वादिष्ट व्यंजन लोगों को पहाड़ी जीवनशैली से रु-ब-रु कराते रहे। दुकानदारों के चेहरों पर रौनक थी — “इस बार व्यापार बहुत अच्छा रहा है, लोकल प्रोडक्ट को पहचान मिल रही है।”
यह मेला केवल मनोरंजन नहीं, एक जीवंत परंपरा है। जहां लोक, संस्कृति और आस्था का मेल होता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर किसी ने इस पर्व को उत्सव की तरह जिया। कार्यक्रम में मनोज भट्ट, प्रवीण पटवाल, सभासद शिप्रा जोशी, प्रकाश चंदौला, बंटी आर्या, शुभम् नैनवाल, उमेश पाठक, हेमा दुम्का, विमला आर्या, आशा उप्रेती, विनोद कुमार, विनीत जोशी, कमरूनिशा, आशा आर्या समेत अनेक सांस्कृतिक प्रेमी शामिल हुए।




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